उत्तरप्रदेश लखनऊ

संपादकीय

 

लखनऊ  भारत एक कृषि प्रधान देश है लेकिन किसानों को अपना हक मागने की जगह लाठिया ही मिलती है। यह देश के लिए गौरव नही अपितु दुर्भाग्य की बात है।

सबसे सस्ता किसान ही जहाँ चाहो वहां धुनो गरीबो का हक छीनो यही सदियों से चलता आ रहा है। गरीबो की सुनने वाला कोई नही राजनीति करने वाले बहुत है

वर्ष 2003 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में ट्रांस गंगा हाई टेक योजना बनी थी उस समय किसानों की जमीन का मुआवजा इतना कम था

कि उन्होंने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं ली थी बाद में 2007 में जब प्रदेश में बीएसपी की सरकार बनी तो मुआवजे की दर 2.51 लाख रुपये से बढ़ाकर 5.51 लाख रुपये कर दी गई।

यूपीएसआईडीसी योजना के तहत भूमि अधिग्रहण का काम वर्ष 2012 तक नहीं कर पाई इसके बाद 2012 में जब फिर से समाजवादी पार्टी की सरकार बनी तो विभाग ने

किसानों की जमीन अधिग्रहण का काम शुरू कर दिया इसके विरोध में किसान सड़क पर उतर आये किसानों की मांग थी कि पूर्व में जो दरें लागू की गई थीं वो वर्तमान में बहुत कम हैं मुआवजे की राशि को बढ़ाया जाए।

उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण के ड्रीम प्रोजेक्ट उन्नाव ट्रांस गंगा सिटी में मुआवजे की मांग को लेकर किसानों ने आपा खो दिया शनिवार सुबह किसान सड़क पर उतर आए और जमकर उपद्रव किया

किसानों ने जेसीबी कार और बस में तोड़फोड़ की 13 थानों की फोर्स ने पहुंचकर स्थिति काबू में करने का प्रयास किया तो उग्र किसानों ने पथराव कर दिया लेकिन यहाँ प्रशासन की सबसे बड़ी लापरवाही सामने आई पिटाई के बाद उग्र ग्रामीणों ने आज पावर

हाउस की पाइप लाइन में आग लगा दिए सबसे पीड़ादायक बात यह कि इन किसानों की जमीन अत्यधिक उपजाऊ और महंगी है और उनको उस जमीन का उचित मुआवजा नही मिल रहा है

सरकार को भी चाहिए कि किसानों की समस्याओ को गम्भीरता से लेते हुये मुख्यमंत्री को स्वयं इस मामले में अपनी रुचि दिखानी चहिए इस तरह के प्रदर्शन में नेता और उपद्रवी लोग किसानों को बरगलाकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेकते है

कुछ ही नेता है जो वकाई जमीन स्तर पर किसानों की हक की लड़ाई के लिए काम करते है उन्नाव के ट्रांसगंगा सिटी में हो रहे किसानों का उग्र प्रदर्शन कब और भी ज्यादा खतरनाक हो जाये।

इससे पहले यूपी सरकार को किसानो की समस्याओ को जल्द से जल्द निपटारा करना होगा ताकि कोई भी उग्र प्रदर्शन हिंसा का रूप धारण ना कर लें। किसान भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है।अन्नदाता भी है इसलिए उनकी मांगों को पर सरकार को एक बार पुनर्विचार अवश्य करना चाहिए।

संतोष कुमार निरंजन संपादक आजतक मीडिया।

 

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