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उत्तरप्रदेश कोंच जालौन

बद्रीविशाल आश्रम देवगांव में चल रही मद्भागवत कथा में भावविभोर हुये श्रोता।

संपादक – संतोष कुमार निरंजन

कोंच(जालौन) कोंच तहसील क्षेत्र के ग्राम देवगांव में परमहंस बद्रीदास महाराज आश्रम में महाशिवरात्रि पर्व से पूर्व आयोजित की जा रही श्रीमद्भागवत कथा के तृतीय दिन शनिवार को कथा व्यास रामप्रकाश भारद्वाज ने संगीतमय कथा का उपस्थित श्रोताओं को रसपान कराते हुए कहा कि महाराज उत्तानपाद के दो विवाह हुए जिसमें एक का नाम सुनीति दूसरे का नाम सुरुचि है।सुरुचि के साथ महाराज उत्तानपाद गंधर्व विधि के द्वारा विवाह करते हैं, जैसे ही सुरुचि के साथ विवाह करके अपने महल में पधारे तो सुनीति को पता लगा कि मेरे महाराज दूसरा विवाह करके आ रहे हैं तो सोने के थाल में आरती सजाकर स्वागत करने के लिए गयी। जैसे ही सुनीति आरती करने लगी उसी समय सुरुचि ने महाराज उत्तानपाद से कहा यह कौन है, उत्तानपाद बोले यह मेरी पत्नी सुनीति है तब सुरुचि ने कहा अगर महल में यह रहेगी तो मैं नहीं रहूंगी अतः इन्हें त्यागना होगा। महाराज उत्तानपाद ने सुरुचि के कहने पर धर्म स्वरूपा महारानी सुनीति को त्याग दिया जिसके बाद महारानी सुनीति राज्य के एक बगीचे में अपनी पर्णकुटी बनाकर रहने लगी और भगवान नारायण का ध्यान करने लगी। कुछ समय व्यतीत होने पर सुनीति ने एक सुंदर से बालक को जन्म दिया जिसका नाम ध्रुव रखा और बचपन से ही ध्रुव भगवत भक्त हुआ।एक दिन बालक ध्रुव खेलते खेलते अपने राजमहल में पहुंचे और अपने पिता उत्तानपाद की गोदी में बैठ गए। महाराज उत्तानपाद भी लाड़ प्यार करने लगे उसी समय सुरुचि वहां आयी और ध्रुव को सिंहासन से नीचे गिरा दिया और कहा कि अगर इस सिंहासन पर बैठने की इच्छा है तो वन में जाकर भगवान का तप करो और जब वह प्रसन्न हो जाएं तो उनसे यह मांगना कि मुझे सुरुचि के गर्भ से जन्म मिले तब इस सिंहासन पर बैठने के अधिकारी होगे।वहीं बालक ध्रुव रोता हुआ अपनी माता सुनीति के पास आया और माता सुनीति से कहा माँ में वन में जा रहा हूं भगवान का तप करने के लिए। सुनीति में बहुत रोका परंतु बालक ध्रुव नहीं रुके और वन की ओर प्रस्थान कर गये। बीच रास्ते में नारद जी से भेंट होती है, नारद जी ने गुरु मंत्र देते हुए आशीर्वाद देकर कहा कि बेटा ध्रुव मथुरा में यमुना किनारे मधुबन नाम का एक वन है वहां जाओ और भगवान का तप करो तुम्हें भगवान अवश्य मिलेंगे।
ध्रुव वहां जाकर 6 माह तक कठोर तप करते हैं तब भगवान नारायण प्रसन्न होकर ध्रुव को मात्र 5 वर्ष की आयु में दर्शन देते हैं।भगवान ने 36 हजार राज्य के सुख का आशीर्वाद उनको दिया।इस प्रकार से ध्रुव ने अल्पआयु में ही भगवान श्रीनारायण के दर्शन प्राप्त किये।कथा विराम के बाद उपस्थित श्रोताओं ने आरती में शामिल होकर प्रसाद ग्रहण किया।इस दौरान आचार्य धनंजय कृष्ण शास्त्री, पारीक्षत अशोक पुष्पा गुप्ता,आश्रम के प्रबंधक पं मदनमोहन तिवारी, पुजारी अशोक दीक्षित,हरगोविन्द खुराना उपस्थित रहे।

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