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मोहम्मदी ख़ानम (बेगम हजरत महल) की पुण्य स्मृति पर विशेष।

 

शान ए अवध “लखनऊ” की 1857 की क्रांति वीरागरांगना बेगम हजरत महल को कोटि कोटि नमन

कानपुर यूपी। वह आज ही का तो दिन था जब अवध की शान, ताक़त,हौंसला और उम्मीद मोहम्मदी ख़ानम यानि बेग़म हज़रत महल दुनिया को छोड़ गईं थीं, अवध की वह बेगम जिसने लपक कर 1857 क्राँति की आग थामी थी और जिसने लखनऊ में अंग्रेज़ों के झण्डे को दुनियां में सबसे पहले ज़मींदोज़ किया था, नवाबों के किस्से तो खूब ज़बानों पर हैं, उन पर तो खूब बातें होतीं रहीं हैं मगर उनके ही बीच से उनकी नाज़ों में पली बढ़ी बेगम ने जब क्रांति की सख़्त तपिश सही उसका ज़िक्र कहीं नहीं होता और होता भी है तो बहुत कम ही होता है।

बेगम ने हर ओर मोर्चा लिया सल्तनत की खूबसूरत ठण्डी हवाओं को सख़्त लू के थपेड़ो में बदलते देखा,अपनी नाक के नीचे खड़े पियादों को बदलते देखा जब ज़मीन की वफ़ादारी की बात आई तो पल पल यहीं लखनऊ से नेपाल तक वफादारों को बालिश्त बालिश्त(बीता-बीता) भर जागीरों में बिकते हुए देखा,अवध के नफीस तख्त से काठमांडू की तंग गालियों में ज़िन्दगी से लड़ने वाली मज़बूत,संवेदनशील,सहनशील और जुझारू बेगम का ज़िक्र आज तो कर ही लें,हमे याद है पिछले दिनों हमारी मांगो पर तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जी ने बेगम हज़रत महल यूनिवर्सिटी बनाने का वादा किया था, लेकिन न सरकार लौटी और न इस पर कोई काम हुआ,ख़ैर फिर भी हम लोग अपनी हैसियत भर ही सही,उस महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को याद तो करें ।

जिस तरह 1857 में बहादुर शाह ज़फ़र को हिंदुस्तान से बाहर वर्मा में दफनाया गया,उनकी यही तड़प थी कि अपने मुल्क में दो गज ज़मीन नही मिली । उसी तरह बेगम को भी दूर नेपाल में जगह मिली ।अपने मुल्क अपने अवध की ज़मीन इतनी तंग हो गई कि उसमें बेग़म के लिए जगह ही नहीं बची, बेगम ने चाहा ही क्या था,अपने अवध की आज़ादी , आज़ादी तो कल भी चुभती थी और आज भी चुभती है । वह टूटकर मिटकर जूझ गई अवध को आज़ाद देखने के लिए..

अफसोस तो तब होता है जब महिलाओं पर बराबरी और उनको आगे लाने वाले समाजसेवियों के बैनर में बेगम हजऱत महल नहीं होतीं हैं,अवध पर जान छिड़कने वालों की ज़बान पर बेगम हज़रत महल नहीं होतीं हैं कवियों, लेखकों की गोष्ठियों में हज़रत महल नहीं होतीं हैं,यही वह हैरतअंगेज़,जुझारू बेगम थी जो बिरतानियो से लड़ती हुई अपने दिल की सुकून गाह से निकली,अवध की खूबसूरत सरज़मीन से रुखसत होकर नेपाल के काठमांडू में आज भी सो रही है।

ज़रा सा बेग़म हज़रत महल को याद कर लीजिये शायद उनका जूझना नज़र ही आ जाए और उनके दामन में ख़ुशी का एक पल ही आए की उनके बाद के लोगों ने उन्हें याद तो रखा । शायद उनका काँटों पर चलना मखमल में बदल जाए,उनके दिल की धड़कन महसूस कीजिये वह आज भी हर बोलने वाले में ज़िंदा हैं,हरआज़ाद ख्याल में ज़िंदा हैं। बेगम मिट्टी से मोहब्बत और वफ़ादारी की एक कभी न मिटने वाली मोहर हैं । आज उनकी कब्र की तस्वीर लगाकर बस इतनी ही दुआ की जितनी तक़लीफ़,धोखे और ज़ुल्म आपने ज़िन्दगी में सहे, सब क़ब्र में फूल बनकर आपके इर्द गिर्द बिखरे रहें । आज हमारे लिए भी मुश्किल वक़्त है, हमारी वफाओं पर भी सवाल है, हमने भी धोखे खाए हैं मगर आपसे इतना तो सीखा ही है कि मिट जाएँगे मगर माटी से मोहब्बत और वफ़ादारी में रत्ती भर कमी नही आने देंगे, आपके पीछे चलने वाले हम कमज़ोर।लोग आपको आज खिराज ए अक़ीदत पेश करते हैं।

वीरेंद्र सिंह सेंगर

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