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उत्तरप्रदेश कालपी जालौन

पंचायत चुनाव भी चारित्रिक आधार की बजाय धनबल और बाहुबल से जीतने का चलन शुरू हो गया।

कालपी(जालौन) उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव चल रहे हैं जहां पंचायत प्रतिनिधि चुनने का तरीका ही बदल गया एक समय था जब लोगों में अपना मुखिया चुनने का मापदंड था कि हमारा मुखिया चरित्रवान ईमानदार न्यायप्रिय सबको साथ लेकर चलने वाला हो सबके सुख दुख में सहभागी हो ।पर अब तो ये पैमाना पूरी तरह बदल गया।ऊपरी तल पर जब ब्यूरोक्रेसी सत्ता को साधने के कृम में नेता और अपराधी गठजोड़ के लिए रेड कारपेट बिछाकर अपने आराम की जगह तलाश रही थी तब निचले स्तर पर भी नौकर शाही इसी प्रतिक्रिया को आगे बढा़ रही थी। सांसदी और बिधायिका के ही नहीं ग्राम पंचायत के चुनाव भी चारित्रिक आधार के बजाए धनबल और बाहुबल से जीतने का चलन शुरू हो गया है।नगदी बंटने लगी है शराब के प्रबन्ध होने लगे जिसने पंचायतों की सियासत का स्वरूप ही बदल कर रख दिया।
उत्तर प्रदेश की सियासत में बाहुबलियों अपराधियों का बोलबाला अचानक नहीं बढा़ पहले अपराधी नेताओं के पीछे चला करते थे उनके कहने से लोगों को डरा धमका कर वोट लेते थे इसकी शुरूआत कब हुई थी ये तो नहीं बता सकता पर जहांतक अपनी जानकारी है ये समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव ने अपने राजनीतिक कैरियर में ऐसे लोगों को खूब पाला पोसा था। जिसे देख कर अन्य दलों ने भी अपराधियों का सहारा लेना शुरु कर दिया।अपराधी नेताओं के बूथ मैनिजमेंट का हिस्सा होने लगे थे।कैंपेन की कमान सम्भालते थे संसाधनों की जुगाड़ करते थे और बदले में सफेदपोशों से उन्हें संरक्षण और सरकारी टेंडर जमीनों पर कब्जा खनन के ठेके आदि हासिल करने में मदद मिलती थी।इस संरक्षण के बलबूते अपराधियों ने अपना सामान्तर सम्राज्य खडा़ कर लिया लेकिन यह दौर ज्यादा लम्बा नहीं चला क्योंकि नेताओं के पीछे चलने वाले गुंडे माफियाओं में भी चुनाव लड़ने की इच्छा पनपने लगी।यह उत्तर प्रदेश में वह दोर था जब कांग्रेस कमजोर हो रही थी और सामाजिक न्याय के नाम पर जातीय नायकों का उभार हो रहा था इन मुखौटों को पहनकर कई अपराधी भी राजनीति में सीधे दाखिल हो गए।
इसकी सबसे बडी़ बानगी है मुख्तार अन्सारी कभी सपा से कभी बसपा से बिधायक का टिकट पाकर जीता यहां तक कि निर्दलीय के रूप में भी चुनाव लड़कर अपने धनबल और बाहुबल का परिचय दिया।याद कीजिए ८०-९०का वह दौर जब प्रदेश की राजनीति में बाहुबलियों की तूती बोलती थी।जिसमें कुछ नाम मुझे याद है जिनमें डी पी यादव,संजय भाटी,मदन भैया,धनंजय सिंह,रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भइया,अमर मणि त्रिपाठी,गुडडू पंडित,अरूण कुमार शुक्ला उर्फ अन्ना,रमाकांत,उमाकांत,श्री प्रकाश शुक्ला,बादशाह सिंह,लटूरी सिंह,विजय मिश्रा,वीरेन्द्र प्रताप शाही,ओम प्रकाश गुप्ता,राम गोपाल मिश्रा,अतीक अहमद,त्रिभुअन सिंह,बृजेश सिंह,मुन्ना बजरंगी,भाजपा नेता कृष्णा नंद राय और अभी हाल ही में मारा गया विकास दुबे जैसे तमाम बाहुबलियों के नाम से लोग कांपते थे।एसे बाहुबलियों को किसी न किसी राजनीतिक दल की सरपरस्ती हासिल थी।वही कई ऐसे भी थे जो बिधानसमा से लेकर लोकसभा का चुनाव भी जीतने की कूबत रखते थे। याद होगा २०१९का आम चुनाव गाजीपुर लोकसभा सीट पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशी मनोज सिन्हा को बाहुबली मुख्तार अन्सारी के भाई अफजाल अन्सारी से चुनाव में हार का सामना करना पडा़ था।
लेकिन आब समय बदल रहा है जिस तरह प्रदेश की योगी सरकार ने अपराधियों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है अब वह उतार के करीब पंहुच गया है इसकी सबसे बडी़ वजह जनता का जागरूक होना तो है ही इसके अलावा हमारी अदालतों और निर्वाचन आयोग ने भी अपराधियों को राजनीति से दूर रखने के लिए साहसिक कदम उठाए हैं।

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