मुख्यमंत्री ने संविधान दिवस पर उपस्थित महानुभावों को भारत के संविधान की उद्देशिका का सपथ पाठ्न कराया - Aaj Tak Media

मुख्यमंत्री ने संविधान दिवस पर उपस्थित महानुभावों को भारत के संविधान की उद्देशिका का सपथ पाठ्न कराया

‘स्वतंत्रता के अमृत महोत्सव’ के समापन पर संविधान की मूल भावना को व्यवहार में उतारने का आह्वान

संवाददाता (लखनऊ)

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संविधान दिवस के अवसर पर उपस्थित महानुभावों को भारत के संविधान की उद्देशिका (प्रस्तावना) का सपथ (शपथ) पाठ्न कराया।

मुख्यमंत्री का संबोधन

मुख्यमंत्री ने कहा कि भारत का संविधान हमें सिखाता है कि नागरिकों को संविधान को सर्वोपरि मानकर सदैव इसका सम्मान करना चाहिए। उन्होंने संविधान की मूल भावना को अपने जीवन का हिस्सा बनाने का आह्वान किया।

  • अधिकार और कर्तव्य: मुख्यमंत्री ने कहा कि यदि हम अपने अधिकारों के साथ-साथ कर्तव्यों का भी पालन करेंगे, तभी यह देश सही दिशा में आगे बढ़ेगा।

  • ईमानदारी का महत्व: उन्होंने कहा कि जो लोग अपने क्षेत्र में पूरी ईमानदारी से कार्य करेंगे, उनके लिए संविधान का पालना सुनिश्चित होगा।

  • संविधान का मूल्य: योगी आदित्यनाथ ने कहा कि संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है और यह देश को गौरव की अनुभूति कराता है।

संविधान निर्माण का स्मरण

  • डॉ. आंबेडकर की भूमिका: मुख्यमंत्री ने संविधान निर्माण में बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि संविधान के निर्माण में 2 वर्ष, 11 महीने और 18 दिन लगे थे।

  • पवित्र दस्तावेज: मुख्यमंत्री ने कहा कि संविधान केवल एक दस्तावेज नहीं, बल्कि राष्ट्र को विश्व में सर्वश्रेष्ठ पहचान दिलाने वाला मार्गदर्शिका है।

  • अखंडता का संकल्प: संविधान दिवस हमें राष्ट्र की संप्रभुता, एकता और अखंडता को मजबूत करने के लिए प्रेरित करता है।

मुख्य बातें

  • उद्देशिका का पाठ्न: मुख्यमंत्री ने बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर के चित्र पर पुष्प अर्पित कर उन्हें श्रद्धांजलि दी, जिसके बाद संविधान की उद्देशिका का सामूहिक पाठ्न हुआ।

  • युवाओं को प्रोत्साहन: इस अवसर पर संविधान के आदर्शों पर आधारित विभिन्न प्रतियोगिताओं के विजेता छात्र-छात्राओं को भी सम्मानित किया गया।

  • शपथ का उद्देश्य: शपथ पाठ्न का उद्देश्य संविधान अंगीकृत किए जाने के अमृत महोत्सव वर्ष के समारोह को आगे बढ़ाना और इसके मूल्यों को जन-जन तक पहुँचाना था।

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