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यूक्रेन-रूस युद्ध की अमेरिकी नीति ने न केवल यूरोप को अस्थिर कर दिया है, बल्कि वैश्विक शांति को भी खतरे में डाल दिया है। ट्रंप प्रशासन की लगातार बदलती रणनीति और रूस के प्रति नरमी ने युद्ध को लंबा खींच दिया है। 2025 में अमेरिकी प्रयासों के बावजूद शांति की कोई ठोस उम्मीद नजर नहीं आ रही।
ट्रंप ने चुनावी वादे के मुताबिक युद्ध को जल्द खत्म करने का दावा किया था, लेकिन उनकी नीतियां रूस के हितों को मजबूत करने वाली साबित हो रही हैं। अमेरिकी विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुश्नर ने मॉस्को में पुतिन के साथ पांच घंटे की बैठक की, लेकिन कोई बड़ा समझौता नहीं हुआ। पुतिन ने अमेरिकी शांति प्रस्ताव के कुछ बिंदुओं को अस्वीकार कर दिया, खासकर उनमें से जो रूस को डोनबास क्षेत्र में पूर्ण नियंत्रण देने से जुड़े हैं।
ट्रंप ने कहा कि उनकी टीम को लगता है कि पुतिन युद्ध खत्म करना चाहते हैं, लेकिन क्रेमलिन ने साफ कर दिया कि यूक्रेन को पूर्वी क्षेत्रों से पीछे हटना होगा वरना रूस बलपूर्वक कब्जा कर लेगा। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की ने किसी भी क्षेत्रीय रियायत को सिरे से खारिज कर दिया है।
2025 की अमेरिकी नीति का असर
- ट्रंप का दबाव: जनवरी से ट्रंप ने यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति रोक दी और रूस के साथ द्विपक्षीय डील पर जोर दिया। इससे यूक्रेन की रक्षक क्षमता कमजोर हुई।
- शांति प्रयास: 20-बिंदु वाले अमेरिकी प्रस्ताव (बाद में 27 बिंदुओं वाला) में रूस को फायदा पहुंचाने वाले प्रावधान थे, जैसे डोनबास का डी फैक्टो नियंत्रण। यूरोपीय देशों ने इसे यूक्रेन के लिए घातक बताया।
- नाटो में तनाव: ट्रंप की नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटेजी में नाटो सहयोगियों को “अवास्तविक अपेक्षाओं” का दोषी ठहराया गया। अमेरिका अब यूक्रेन के लिए यूरोप से फंडिंग (PURL प्रोग्राम के तहत $3 बिलियन) पर निर्भर है।
- रूस की मजबूती: पुतिन ने भारत दौरे पर मोदी से ईंधन सप्लाई बढ़ाने का वादा किया, जिससे रूस की अर्थव्यवस्था मजबूत हुई। युद्ध में रूस ने 85% डोनबास पर कब्जा कर लिया।
यूरोपीय नेता, जैसे मैक्रॉन, अब चीन को शामिल करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन पुतिन की जिद और ट्रंप की नरम रुख से शांति दूर नजर आ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह अमेरिकी विदेश नीति का सबसे शर्मनाक अध्याय है, जहां ट्रंप के रियल एस्टेट वाले दूत पुतिन को “बुरा आदमी” नहीं मानते। युद्ध थमने के बजाय और भयावह हो रहा है।
