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नई दिल्ली। 1945 में द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के साथ वैश्विक सत्ता का संतुलन पूरी तरह बिगड़ गया था। ब्रिटेन-फ्रांस की कमजोर होती पकड़ ने अरब दुनिया को एकजुट होने का मौका दिया। इसी का नतीजा था 22 मार्च को काहिरा में अरब लीग (लीग ऑफ अरब स्टेट्स) की स्थापना। सात संस्थापक सदस्य—मिस्र, इराक, ट्रांसजॉर्डन (अब जॉर्डन), लेबनान, सऊदी अरब, सीरिया और उत्तरी यमन—ने इस संगठन को जन्म दिया। लेकिन इसके पीछे का असली मकसद था अरब राष्ट्रवाद को मजबूत करना, फिलिस्तीन को ब्रिटिश हवाले से बचाना और आर्थिक-सांस्कृतिक एकीकरण।
दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र सूचना केंद्र (UNIC) ने इस ऐतिहासिक घटना पर विशेष चर्चा का आयोजन किया। विशेषज्ञों ने बताया कि अरब लीग का चार्टर सदस्य राज्यों के बीच विवाद सुलझाने, आर्थिक सहयोग बढ़ाने और राजनीतिक लक्ष्यों को समन्वित करने पर केंद्रित था। लेकिन 1945 के उस दौर में यह संगठन फिलिस्तीन मुक्ति के लिए एकजुट हुआ, जो बाद में 1948 के अरब-इजरायल युद्ध में नाकाम साबित हुआ।
सीरिया की भूमिका: संस्थापक से निष्कासन तक का सफर सीरिया, जो अरब लीग का संस्थापक सदस्य था, ने हमेशा पैन-अरबवाद को बढ़ावा दिया। 1944 के अलेक्जेंड्रिया प्रोटोकॉल के बाद यह संगठन अस्तित्व में आया, जिसमें सीरिया ने फ्रांसीसी उपनिवेशवाद से मुक्ति के बाद अपनी स्वतंत्रता को मजबूत करने का फैसला किया। लेकिन 2011 के गृहयुद्ध के बाद सीरिया को लीग से निष्कासित कर दिया गया, क्योंकि बशर अल-असद सरकार पर नागरिकों पर अत्याचार के आरोप लगे। मई 2023 में, काहिरा सम्मेलन में सीरिया को फिर से सदस्यता बहाल की गई—एक ऐसा कदम जो कैप्टागन ड्रग तस्करी, शरणार्थी संकट और ईरानी प्रभाव को काबू करने के लिए उठाया गया।
राजनीतिक बदला: बहाली पर चर्चा चर्चा में विशेषज्ञों ने कहा कि अरब लीग की स्थापना ने सीरिया जैसे देशों को अंतरराष्ट्रीय मंच दिया, लेकिन आंतरिक विवादों ने इसे कमजोर किया। 1945 के बाद लीग ने 22 सदस्यों तक विस्तार किया, लेकिन सीरिया का निष्कासन (2011) और पुनर्वास (2023) ने क्षेत्रीय स्थिरता पर सवाल खड़े किए। जॉर्डन, सऊदी अरब और मिस्र जैसे देशों ने इसे “अरब समस्याओं का अरब हल” बताया, लेकिन अमेरिका-यूरोपीय संघ ने राजनीतिक सुधारों की शर्त रखी।
न्याय, शांति और राष्ट्रीय संवाद: आज का संदेश UNIC के आयोजन में वक्ताओं ने जोर दिया कि लीग ने सुलह-समझौते को बढ़ावा दिया, लेकिन फिलिस्तीन मुद्दे पर असफलता ने सबक सिखाया। सीरिया की बहाली से शरणार्थी संकट (5.7 मिलियन) कम करने और ड्रग तस्करी रोकने की उम्मीद है। राजनीतिक संवाद से ही मध्य पूर्व में स्थायी शांति संभव है—यह 1945 का संदेश आज भी प्रासंगिक है।
