जनपद कानपुर देहात | दिनांक : 06 नवम्बर 2025
उप कृषि निदेशक हरिशंकर भार्गव ने जनपद के कृषक भाइयों से अपील की है कि वे फसल अवशेष / पराली को कदापि न जलाएं, क्योंकि इससे न केवल पर्यावरणीय क्षति होती है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य, मित्र कीटों एवं फसलों की उत्पादकता पर भी गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। पराली जलाने से मिट्टी का तापमान बढ़ता है, जिससे मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव नष्ट हो जाते हैं और जीवांश के विघटन की प्रक्रिया बाधित होती है।
उन्होंने बताया कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फसल अवशेष जलाने पर पूर्णतः रोक लगाई गई है तथा इसे दण्डनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) के प्रावधानों के अनुसार —
-
02 एकड़ से कम क्षेत्र में पराली जलाने पर ₹5,000/- प्रति घटना,
-
02 से 05 एकड़ क्षेत्र में ₹10,000/- प्रति घटना,
-
तथा 05 एकड़ से अधिक क्षेत्र में ₹30,000/- प्रति घटना का अर्थदंड लगाया जाएगा।
उप कृषि निदेशक ने किसानों से कहा कि वे पराली प्रबंधन के लिए निम्न वैकल्पिक उपाय अपनाएं —
-
फसल कटाई उपरांत हैप्पी सीडर, सुपर सीडर, एम.बी. प्लाउ, गल्वर जैसे कृषि यंत्रों से खेत की जुताई करें, जिससे अवशेष मिट्टी में मिल जाए।
-
यूरिया / वेस्ट डिकम्पोजर का छिड़काव कर खेत में पानी लगाएं ताकि अवशेष सड़कर जैविक खाद में परिवर्तित हो जाए।
-
फसल अवशेष से कम्पोस्ट या वर्मी कम्पोस्ट तैयार कर जैविक उर्वरक के रूप में उपयोग करें।
-
पराली को पशु चारे के रूप में प्रयोग करें अथवा गौशालाओं को दान करें।
-
जिला प्रशासन द्वारा संचालित “पराली दो, खाद लो” अभियान के अंतर्गत किसान दो ट्रॉली पराली देकर एक ट्रॉली गोबर खाद प्राप्त कर सकते हैं।
उप कृषि निदेशक ने सभी कृषकों से पुनः अनुरोध किया कि वे फसल अवशेष न जलाएं और पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ अपनी मिट्टी की उर्वरता को बनाए रखने में सहयोग करें।
