अपाहिज हो जाती है जिंदगी, फाइलेरिया से बचने को जरूर खाएं दवा

Feb 22, 2024 - 18:42
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अपाहिज हो जाती है जिंदगी, फाइलेरिया से बचने को जरूर खाएं दवा

उन्नाव, 22 फरवरी 2024 । अचलगंज ब्लॉक के बन्थर गांव के निवासी 56 वर्षीय वीरेंद्र यादव फाइलेरिया से ग्रसित हैं। वह बताते हैं कि अब से करीब 20 साल पहले मेरे दाहिने पैर का वजन अचानक बढ़ने लगा, धीरे-धीरे पैर इतना फूल गया कि एक-एक कदम चलना भारी हो गया। झांड़-फूंक कराया, जड़ी-बूटी बंधवाई, लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। इसके बाद सरकारी अस्पताल में दिखाया जहां चिकित्सकों ने बताया कि फाइलेरिया है और अब इसका कुछ नहीं हो सकता क्योकि बहुत देर हो चुकी है, चलना फिरना दूभर हो गया था फाइलेरिया ने लगभग अपाहिज बना दिया था। अच्छी ख़ासी खेती बर्बाद हो गई और छह बच्चों के परिवार को पालना मुश्किल हो गया। बच्चों की पढ़ाई भी नहीं हो सकी। रिश्तेदारों और परिचितों ने दूरी बना ली। यह बीमारी एक अभिशाप है और इसके साथ जिंदगी बोझ। अभी भी आराम नहीं मिला है पैर से लगातार पानी सा बहता रहता है। 

पिछले महीने गांव में लखनऊ से एक संस्था सेंटर फॉर एडवोकेसी एंड रिसर्च (सीफॉर) के लोग आए थे और उन्होंने बताया कि 10 से 28 फरवरी तक फाइलेरिया से बचाव की दवा खिलाने का अभियान चलेगा। इसके साथ ही उन्होंने बताया कि गांव में फाइलेरिया मरीजों का प्लेटफॉर्म बना रहे हैं वह चाहें तो इस प्लेटफॉर्म से जुड़कर गांव में लोगों को इस बीमारी से बचा सकते हैं। संस्था के लोगों ने ही बताया कि फाइलेरिया का कोई इलाज नहीं है। फाइलेरिया से बचाव की दवा का सेवन करके इस बीमारी से बचा जा सकता है। हमें यह जानकर आश्चर्य हुआ और अफसोस भी कि हमने समय पर फाइलेरिया से बचाव की दवा क्यों नहीं खाई। संस्था के लोगों ने कहा अभियान के दौरान यदि वह अपने को उदाहरण के तौर पर रखेंगे और लोगों से दवा खाने के लिए कहेंगे तो लोग फाइलेरियारोधी दवा खा लेंगे। इसी दौरान मैंने एक निर्णय लिया कि मेरी जिंदगी तो गुजर गई लेकिन अब मैं किसी को इस तरह से घुट-घुटकर जीने नहीं दूंगा, मैं लोगों को अपनी कहानी सुनाकर... अपना पांव दिखाकर फाइलेरिया से बचाव की दवा खाने की अपील करूगां। इसके बाद मैं फाइलेरिया पेशेंट प्लेटफॉर्म से जुड़ गया और आशा कार्यकर्ता से फाइलेरिया से बचाव की दवा का सेवन करवाने के अभियान में सहयोग करने की बात कही। गांव में जो लोग भी दवा खाने से इंकार करते हैं, उनके पास आशा के साथ जाता हूं और उन्हें अपना पैर दिखाकर समझाता हूं कि फाइलेरिया बीमारी से बचना है तो दवा अवश्य खाएं, जिससे कि उन्हें मेरे जैसी जिंदगी न जीनी पड़े। इसी महीने दस फरवरी से शुरू हुए आईडीए अभियान में अब तक फाइलेरियारोधी दवा खाने से इंकार करने वाले 20 लोगों को दवा खिला चुका हूं। 

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हर किसी को खानी है दवा ---

जिला मलेरिया अधिकारी रमेश यादव ने बताया कि आईडीए अभियान के दौरान इन दिनों स्वास्थ्य कार्यकर्ता घर-घर जाकर लोगों को फाइलेरिया से बचाव की दवा खिला रहें हैं। ऐसे में हर कोई स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के सामने ही दवा खाएं और अपने परिवार व आसपास के लोगों को भी यह दवा खाने को प्रेरित करें। इस दवा का सेवन दो साल से कम उम्र के बच्चों, गर्भवती और गंभीर बीमार को छोड़कर सभी को करना है। यह दवा उन लोगों को भी खानी है, जिन्हें फाइलेरिया नहीं है। दवा खाली पेट नहीं खानी है। उन्होंने यह भी बताया कि यह दवाएं पूरी तरह सुरक्षित हैं। इनका कोई विपरीत प्रभाव नहीं है। फिर भी किसी को दवा खाने के बाद उल्टी, चक्कर, खुजली या जी मिचलाने जैसे लक्षण होते हैं, तो यह इस बात का प्रतीक हैं कि उस व्यक्ति के शरीर में फाइलेरिया के परजीवी मौजूद है। ऐसे लक्षण इन दवाओं के सेवन के उपरांत शरीर के भीतर परजीवियों के मरने के कारण उत्पन्न होते हैं। सामान्यतः ये लक्षण स्वतः समाप्त हो जाते हैं, परंतु ऐसी किसी भी परिस्थिति से निपटने के लिए प्रशिक्षित रैपिड रिस्पॉन्स टीम आरआरटी भी बनाई गई है। आवश्यकता पड़ने पर आरआरटी को उपचार के लिए आशा कार्यकर्ता के माध्यम से बुलाया जा सकता है। 

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ऐसे करें बचाव नोडल अधिकारी डा. जे.आर.सिंह ने बताया कि फाइलेरिया से बचाव के लिए फाइलेरियारोधी दवा का सेवन करना और मच्छरों से बचना जरूरी है और मच्छरों से बचाव के लिए घर के आस-पास पानी, कूड़ा और गंदगी जमा न होने दें। घर में भी कूलर, गमलों अथवा अन्य चीजों में पानी न जमा होने दें। सोते समय पूरी बांह के कपड़े पहने और मच्छरदानी का प्रयोग करें। यदि किसी को फाइलेरिया के लक्षण नजर आते हैं तो वे घबराएं नहीं। स्वास्थ्य विभाग के पास इसका पूरा उपचार उपलब्ध है। विभाग स्तर पर मरीज का पूरा उपचार नि:शुल्क होता है। इसलिए लक्षण नजर आते ही तुरंत ही सरकारी अस्पताल जाएं।

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