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उत्तरप्रदेश कालपी जालौन

आज के ही दिन धरती पर गंगा का अवतरण हुआ था इसलिए मनाया जाता है गंगा दशहरा का पर्व।

कालपी(जालौन) ऋषि भागीरथ की कठोर तपस्या से प्रशन्न होकर गंगा धरती पर आई थीं ।कोरोना के चलते इस बार लोगों ने घर में रहकर ही गंगा दशहरा का व्रत कर पूजा करने के बाद गंगा जी की प्रथ्वी पर अवतरण की कथा सुनी।
हिन्दू धर्म में गंगा को पवित्र पावनी कहा गया है अर्थात गंगा में स्नान करने से पापों का नाश होता है और पापी भी तर जाते हैं ।पौराणिक मान्यता के अनुशार गंगा दशहरा के दिन लाखों भक्त गंगा में स्नान करते थे।लेकिन इस वर्ष कोरोना काल से संभव नहीं है।
पौराणिक कथा के अनुशार एक बार महाराज सगर ने व्यापक यज्ञ किया उस यज्ञ की रक्षा का भार उनके पौत्र अंशुमान ने संभाला इन्द्र ने सागर के आश्वीय यश्व का अपहरण कर लिया यह यज्ञ के लिए विघ्न था परिणामत:अंशुमान ने सगर की साठ हजार प्रजा लेकर अश्व को खोजना शुरू कर दिया सारा भूमंडल खोज लिया पर अश्व नहीं मिला फिर अश्व को पाताल लोक में खोजने के लिए पृथ्वी को खोदा गया खुदाई पर उन्होंने देखा कि साक्षात भगवान महिर्षि कपिल के रूप में तपस्या कर रहे हैं उन्हीं के पास सगर का अश्व घास चर रहा है प्रजा उन्हें देख कर चोर चोर चिल्लाने लगी‌।महिर्षि कपिल की समाधि टूट गई ज्यों ही महिर्षि ने अपने आग्नेय नेत्र खोले त्यों ही सारी प्रजा भस्म हो गई।इन मृत लोगों के उद्दार के लिए ही महाराज दिलीप के पुत्र भागीरथ ने कठोर तपस्या की उनकी कठोर तपस्या से प्रशन्न होकर बृम्हा जी ने उनसे वर मांगने को कहा तो भागीरथ ने गंगा की मांग की।
इस फर बृम्हा जी ने कहा तुम गंगा का पृथ्वी पर अवतरण तो चाहते हो परंतु क्या तुमने पृथ्वी से पूछा कि वह गंगा का भार व वेग संभाल पाएंगी।मेरा विचार है गंगा के वेग को संभालने की शक्ति केवल भगवान शंकर में है।इस लिए यह उचित होगा कि गंगा का भार व वेग संभालने के लिए भगवान शिव का अनुग्र ह प्राप्त करो।
महाराज भागीरथ ने वैसा ही किया उनकी कठोर तपस्या से प्रशन्न होकर बृम्हाजी ने गंगा की धारा को अपने कमंडल से छोडा़ तब भगवान शिव ने गंगा की धारा को अपनी जटाओं में समेटकर जटाएं बांध लीं ।इसका परिणाम यह हुआ कि गंगा को जटाओं से बाहर निकलने का पथ नहीं मिल सका ।अब भागीरथ को और भी अधिक चिंता हुई उन्होंने एक बार फिर भगवान शिव की आराधना में घोर तप शुरू कर दिया।
तब खहीं भगवान शिव ने गंगा को जटाओं से मुक्त करने का वरदान दिया।शिव की जटाओं से छूटकर गंगा जी हिमालय की घाटियों में कल कल निनाद करके मैदान की ओर मुडी़।इस प्रकार भागीरथ पृथ्वी पर गंगा का वरण करके भडे़ भाग्यशाली हुए। और अपने परिजनो का तरन तारन किया।युगों युगों तक बहने वाली गंगा की धारा महाराज भागीरथ की कष्टमयी साधना की गाथा कहती है।उन्होंने जन मानस को अपने पुण्य से उपकृत कर दिया।गंगा प्राणीमात्र को जीवन दान ही नहीं मुक्ति भी देती है।इसी कारण भारत से लेकर विदेशों तक में गंगा की महिमा गाई जाती है।

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