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ट्रैक्टर और मशीनरी युग होने के बाद भी अभी भी खेतों में दिखाई दे जाते हैं किसानों द्वारा चलाए जाते हुए बैलों के हल।

 

किसानों के बैल पालने से गौमाता के संवर्धन संरक्षण मिशन को मजबूती मिलेगी

वीरेंद्र सिंह सेंगर

जुहीखा औरैया
देश में जहां आज कलयुग यानी कल पुर्जों का युग और किसानी के क्षेत्र में देखा जाए तो विशेष तौर से ट्रैक्टर का युग चलने का असर कहीं न कहीं गौ संरक्षण और संवर्धन मिशन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है लेकिन इसके बाद भी आज कहीं ना कहीं किसानों द्वारा अपनी खेती बैलों के हल से जुताई करते हुए देखा जा सकता है यह किसान चंबल वैली पंचनद धाम क्षेत्र के जुहीखा गांव के शिवदास सविता हैं आज भी बैलों का हल खेतों में चला रहे हैं जो इस बात का दर्शाता है कि खेती बैलों पर आश्रित इसलिए थी कि बैलों के हल खेतों में जुताई करने में अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे क्योंकि बैलों का हल खेतों में गहराई से जुताई करता था जिससे खेतों की गहराई से गुड़ाई हो जाती है।

बताते चलें कि कृषि वैज्ञानिक भी किसानों को सलाह देते हैं की खेतों की जुताई हर 5 वर्ष में लगभग आधा मीटर की गहराई से करने पर खेत की उर्वरा शक्ति में बढ़ोतरी होती है। लेकिन आज ट्रैक्टर रखने वाले किसान खेतों की जुताई ज्यादा गहराई से नहीं करते हैं जिसके पल्सर रूप फसल का ग्राफ दिन पर दिन गिरता चला जा रहा है इसलिए आज भी अच्छी फसल लेने के लिए खेतों की अच्छी गुड़ाई होनी चाहिए और यह सिर्फ बैलों के हल से ही संभव है, और बैल यदि किसान अपने पास रखने लगे तो गाय का भी संवर्धन और संरक्षण मिशन में भी मदद मिल सकती है जैसा कि पहले होता भी रहा है कि बैलों की चाहत ही गौवंश को बचाने का अभी तक कार्य करती रही है लेकिन जब से बैलों का किसानों ने रखना बंद कर दिया है तभी से गौ माता का अस्तित्व खतरे में दिखाई दे रहा है, और इसके साथ साथ किसान भी अपनी खेती को नजर अंदाज कर उर्वरा शक्ति खोता चला जा रहा है जिससे उसको अपने खेतों में उपज भरपूर नहीं मिल पा रही है।

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